वर्दी में ‘वायरल’ का जुनून: कानून के रखवाले या रील्स के सितारे?

‘अभिरक्षक लोक’ यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि वह किसी पर तंज कसने नहीं, बल्कि अनुशासन का आईना दिखाने निकला है। पर जब आईना सामने आता है, तो तस्वीर अपने आप व्यंग्य बन जाती है। झारखंड पुलिस मुख्यालय की सख्त हिदायत के बावजूद वर्दीधारी जवान और अधिकारी इन दिनों कानून की किताब कम और मोबाइल का कैमरा ज्यादा खोल रहे हैं।

मुख्यालय ने साफ कहा था—ड्यूटी के दौरान या वर्दी में वीडियो बनाना और सोशल मीडिया पर डालना पूरी तरह प्रतिबंधित है। लेकिन लगता है कुछ पुलिसकर्मी इस आदेश को ‘रील्स की स्क्रिप्ट’ समझ बैठे हैं। रांची, धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, गिरिडीह और पलामू—लगभग हर जिले से ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जहां थाना परिसर, सरकारी गाड़ी और सार्वजनिक जगहें ‘शूटिंग लोकेशन’ बन चुकी हैं। कुछ मामलों में तो सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी भी इस डिजिटल क्रांति में पीछे नहीं हैं।

अब दृश्य की कल्पना कीजिए—एक ओर वर्दी, जो कानून और अनुशासन का प्रतीक है; दूसरी ओर वही वर्दी भोजपुरी गानों पर ठुमके लगाती नजर आती है। कहीं हथियार के साथ ‘एंट्री शॉट’ है, तो कहीं पत्नी के साथ ‘रोमांटिक सीन’। सवाल यह नहीं कि प्यार गलत है, सवाल यह है कि क्या यह सब वर्दी में, ड्यूटी के बीच और सरकारी संसाधनों के साथ होना चाहिए?

विभाग ने भी अब ‘एक्शन मोड’ ऑन कर दिया है। रांची और धनबाद में कारण बताओ नोटिस, बोकारो और हजारीबाग में लाइन हाजिर, जबकि गिरिडीह और पलामू में जांच शुरू हो चुकी है। 26 जनवरी 2026 को पलामू के हुसैनाबाद थानेदार का पत्नी संग वीडियो वायरल हुआ—नतीजा, लाइन हाजिर। 29 मार्च 2026 को धनबाद के राजगंज थाना प्रभारी अलीशा ने ठुमके लगाए—फिर वही हश्र। 2025 में मेदिनीनगर के एएसआई अभिमन्यु सिंह और 10 जनवरी 2025 को हजारीबाग के सब-इंस्पेक्टर का मामला भी इसी सूची में जुड़ गया। 22 नवंबर 2024 को बोकारो में थाना परिसर ही स्टूडियो बन गया था।

मुख्यालय बार-बार याद दिला रहा है कि वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का प्रतीक है। लेकिन लगता है कुछ लोग इसे ‘कॉस्ट्यूम’ समझ बैठे हैं। उन्हें यह भी समझना होगा कि सोशल मीडिया पर कुछ लाइक्स और व्यूज के लिए अगर अनुशासन दांव पर लग गया, तो नुकसान सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, पूरी पुलिस व्यवस्था की छवि को होगा।

असल सवाल यही है—क्या पुलिसकर्मी ‘कानून के रखवाले’ बनना चाहते हैं या ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’? क्योंकि दोनों भूमिकाएं एक साथ निभाना आसान नहीं। एक में गंभीरता चाहिए, दूसरे में ग्लैमर।

‘अभिरक्षक लोक’ बस इतना कहना चाहता है—रील्स बनाइए, कोई रोक नहीं है, लेकिन वर्दी उतारकर। क्योंकि जब वर्दी पहनी जाती है, तो वह सिर्फ शरीर पर नहीं, जिम्मेदारी के कंधों पर भी होती है। और उस जिम्मेदारी का कोई ‘रीटेक’ नहीं होता।

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